शनिवार, 10 सितंबर 2011

" मैं हूँ अन्ना " क्या ये सिर्फ एक वाक्य है ?


9/11 आज से ठीक 10 साल पहले आज ही के दिन ने दुनिया का इतिहास बदल दिया था और साथ ही बदल दी थी अमेरिका की सोच | युग बदले , दुनिया बदली पर नहीं बदले तो हम , 26/ 11 की चोट भी हमें न बदल सकी ..   


क्या हम इतने ढीठ हैं जो बदलना नही चाहते या फिर 26/ 11 की मार उतनी तेज नही थी की हम बदल सकते ?
या फिर यूँ भी कहा जा सकता है की इस तरह की चोटें खाते रहने के हम आदि हो चुके हैं और इन्सान की जान की कीमत हमारे लिए शुन्य हो गयी है | 
जब भी ऐसा कोई वाकया घटता है तो हम फिकरमंद होते हैं सिर्फ अपने चंद  सगे सम्बन्धियों के लिए , अगर सम्बन्ध ज्यादा नजदीक का है तो हम फोन कर लेते हैं नही तो सिर्फ कुछ sms से सभी अपनों का हाल जाना , न्यूज़ देखी , कुछ देर सरकार को कोसा और बस ..... फिर दुसरे ही दिन से हमारी दिनचर्या बिलकुल पूर्ववत हो जाती है जैसे कुछ हुआ ही नहीं था .... 


भारत इंग्लैंड में क्रिकेट matches क्यों हारता जा रहा है ? ये एक बड़ा प्रश्न है हमारे लिए , हम इसके बारे में सोचते भी हैं और आकलन के लिए समितियां भी गठित करते हैं , पर उन तमाम बेक़सूर जानों  का क्या जो हर दो चार महीने बाद अकारण ही बलि चढ़ जाती हैं ?

क्या हर लड़ाई के लिए हमें अन्ना की जरूरत है ? " मैं हूँ अन्ना " क्या ये सिर्फ एक वाक्य है ?
हम ऐसे क्यों हैं ? और ऐसे ही क्यों बनते चले जा रहे हैं ? संवेदनाशून्य , लापरवाह , गैर जिम्मेदार ? हमें कुम्भकरण की नींद से जागने के लिए किस अलार्म का इंतज़ार है ? मैं नहीं समझ पा रही हूँ , क्या आप लोग समझ पा  रहे हैं ? अगर हाँ तो ये सब समझने में मेरी मदद कीजिये .......

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